Khair Assembly Seat: खैर सीट का सियासी गणित समझिए, जाट वोटों के साथ इन जातीय समीकरणों पर रहेगी नजर

Khair Assembly Seat: एससी आरक्षित सीट पर जाट मतदाता सबसे बड़ा समूह, 2022 की बीजेपी जीत और 2024 के बदले समीकरण ने बढ़ाई चुनावी दिलचस्पी

Khair Assembly Seat उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर राजनीतिक गतिविधियां धीरे-धीरे तेज हो रही हैं। ऐसे में अलीगढ़ जिले की खैर विधानसभा सीट के सामाजिक और चुनावी समीकरण पर भी नजरें टिक गई हैं। अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित यह सीट जाट मतदाताओं की बड़ी आबादी के कारण पश्चिमी उत्तर प्रदेश की चर्चित सीटों में शामिल रही है। उपलब्ध चुनावी विश्लेषणों में यहां जाट मतदाताओं की संख्या करीब 1.15 लाख बताई गई है। एससी और ब्राह्मण मतदाता भी बड़ी संख्या में हैं।

एससी आरक्षित सीट पर जाट वोट क्यों महत्वपूर्ण?

खैर विधानसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है, लेकिन क्षेत्र का सामाजिक समीकरण इसे सामान्य आरक्षित सीटों से अलग बनाता है। यहां जाट समुदाय की आबादी काफी बड़ी है। इसके अलावा एससी, ब्राह्मण, मुस्लिम, क्षत्रिय, वैश्य और विभिन्न पिछड़े वर्गों के मतदाता भी चुनावी तस्वीर का हिस्सा हैं।

2024 के उपचुनाव से पहले प्रकाशित चुनावी विश्लेषण में खैर में करीब 1.15 लाख जाट, 60 हजार से अधिक ब्राह्मण और एक लाख से अधिक एससी मतदाताओं का अनुमान बताया गया था। मुस्लिम मतदाताओं की संख्या करीब 30 हजार और वैश्य मतदाता करीब 40 हजार बताए गए थे। ये आंकड़े अनुमानित सामाजिक समीकरण हैं, आधिकारिक जातिवार मतदाता सूची नहीं।

पुराने चुनावों में बदलता रहा राजनीतिक समीकरण

खैर की चुनावी राजनीति में अलग-अलग दौर में अलग दलों को सफलता मिली है। 2002 में बसपा के प्रमोद गौड़ ने जीत दर्ज की थी। इसके बाद 2007 और 2012 में आरएलडी ने सीट पर कब्जा किया। 2017 में बीजेपी ने वापसी की और 2022 में भी पार्टी ने सीट बरकरार रखी। 2008 के परिसीमन के बाद खैर विधानसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो गई।

इससे साफ है कि खैर में लंबे समय तक किसी एक दल का लगातार वर्चस्व नहीं रहा और अलग-अलग चुनावों में गठबंधन तथा सामाजिक समीकरणों के आधार पर परिणाम बदले हैं।

2022 में बीजेपी को मिली बड़ी बढ़त

2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के अनूप प्रधान ने खैर सीट पर जीत दर्ज की। बीजेपी को 1,39,643 वोट मिले, जबकि बसपा की चारू कैन को 65,302 वोट मिले। आरएलडी-सपा गठबंधन के उम्मीदवार भगवती प्रसाद को 41,644 वोट मिले।

बीजेपी और बसपा के बीच करीब 74 हजार वोटों का अंतर रहा। उस चुनाव में आरएलडी-सपा गठबंधन जाट बहुल क्षेत्र होने के बावजूद बड़ी संख्या में जाट वोट अपने पक्ष में नहीं ला सका।

2024 में लोकसभा चुनाव ने बदल दी तस्वीर

2024 के लोकसभा चुनाव में खैर विधानसभा क्षेत्र का परिणाम 2022 के मुकाबले काफी अलग रहा। अलीगढ़ लोकसभा क्षेत्र के तहत आने वाली खैर विधानसभा सीट पर सपा ने बीजेपी पर करीब 1,400 वोटों की बढ़त बनाई।

सपा को 95,606 और बीजेपी को 94,205 वोट मिले, जबकि बसपा 31,037 वोटों पर रही। इस परिणाम ने खैर के पिछले विधानसभा चुनावी समीकरण से अलग तस्वीर पेश की।

इस चुनाव में बीजेपी और आरएलडी गठबंधन में थे, जबकि सपा और कांग्रेस साथ चुनाव लड़ रहे थे। उम्मीदवारों की सामाजिक पृष्ठभूमि और गठबंधन की स्थिति का भी स्थानीय मतदान पर असर पड़ा।

उपचुनाव में बीजेपी ने फिर हासिल की सीट

2024 लोकसभा चुनाव के बाद खैर विधानसभा सीट पर उपचुनाव हुआ। बीजेपी ने सुरेंद्र दिलेर को उम्मीदवार बनाया, जबकि सपा ने चारू कैन पर भरोसा जताया।

उपचुनाव में बीजेपी के सुरेंद्र दिलेर को 1,00,181 वोट मिले। उन्होंने सपा की चारू कैन को 38,393 वोटों के अंतर से हराया। चारू कैन को 61,788 वोट मिले, जबकि बसपा के पहल सिंह 13,365 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।

इस तरह लोकसभा चुनाव में खैर विधानसभा क्षेत्र में मिली सपा की बढ़त विधानसभा उपचुनाव में कायम नहीं रह सकी।

2027 के लिए किन वोटरों पर नजर?

खैर के चुनावी समीकरण में जाट मतदाता सबसे बड़ा समूह बताए जाते हैं। इसके बाद एससी और ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या महत्वपूर्ण है। मुस्लिम, क्षत्रिय, वैश्य और विभिन्न अति पिछड़ी जातियों के मतदाता भी कुल परिणाम को प्रभावित करने की स्थिति में हैं।

अनुमानित आंकड़ों के मुताबिक खैर में करीब 1.15 लाख जाट, 65 हजार एससी, 45 हजार ब्राह्मण और 30 हजार मुस्लिम मतदाता हैं। इसके अलावा करीब 24 हजार क्षत्रिय, 15 हजार बनिया, 11 हजार सूर्यवंशी, 10 हजार कश्यप, 9 हजार नाई और अन्य कई सामाजिक समूहों के मतदाता हैं।

खैर में 2027 का समीकरण किस दिशा में जाएगा?

पिछले तीन चुनावों के आंकड़ों को देखें तो खैर में मतदाताओं का रुझान चुनाव-दर-चुनाव बदलता रहा है। 2022 में बीजेपी ने विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत दर्ज की, 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने खैर क्षेत्र में बढ़त बनाई और उसी साल हुए विधानसभा उपचुनाव में बीजेपी ने फिर सीट जीत ली।

इसलिए 2027 के चुनाव में जातीय समीकरण के साथ उम्मीदवार, गठबंधन और स्थानीय मुद्दे भी महत्वपूर्ण रहेंगे। आरक्षित सीट होने के कारण प्रत्याशियों का सामाजिक आधार भी चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा होगा। जाट, एससी और ब्राह्मण मतदाताओं के अलावा ओबीसी और मुस्लिम वोटों का बंटवारा भी परिणाम को प्रभावित कर सकता है।

खैर के पिछले चुनावी परिणामों में आया बदलाव यह संकेत देता है कि यहां किसी एक चुनाव के आंकड़ों के आधार पर अगले चुनाव का पूरा अनुमान लगाना आसान नहीं है। 2027 में वास्तविक तस्वीर उम्मीदवारों और गठबंधनों की घोषणा के बाद ही अधिक स्पष्ट होगी।

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