Election Commission of India: विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के जरिए मतदाता सूचियों को संशोधित करने की प्रक्रिया में बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने का मुद्दा चर्चा में है। अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने इस प्रक्रिया से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए करीब 70 लाख ऐसे संभावित पात्र मतदाताओं का अनुमान लगाया है, जिनके नाम हटाए जाने की वजह उनके आकलन में स्पष्ट नहीं हो पाई है। हालांकि, यह संख्या चुनाव आयोग का आधिकारिक आंकड़ा नहीं, बल्कि भल्ला की गणना पर आधारित अनुमान है।
मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के कुल आंकड़े और उन नामों की संख्या, जिनके हटने का कारण स्पष्ट नहीं है, दोनों को अलग-अलग समझना जरूरी है। रिपोर्ट में करीब 13.37 करोड़ नाम हटाए जाने का उल्लेख है, जबकि 70 लाख का आंकड़ा भल्ला के विश्लेषण में सामने आए संभावित अंतर से संबंधित है।
किन कारणों से हटाए गए नाम?
SIR के दौरान मतदाता सूचियों में संशोधन करते समय नाम हटाने के कई कारण बताए गए हैं। उपलब्ध आंकड़ों के विवरण के अनुसार, इनमें मृत मतदाता, स्थायी रूप से दूसरी जगह जा चुके लोग, एक से अधिक स्थानों पर दर्ज नाम और सत्यापन के दौरान नहीं मिल पाए मतदाता शामिल हैं।
रिपोर्ट में इन श्रेणियों के तहत लगभग निम्नलिखित आंकड़े बताए गए हैं:
- 2.8 करोड़ नाम: मृत मतदाताओं के रूप में दर्ज।
- 6.3 करोड़ नाम: स्थायी रूप से दूसरी जगह जा चुके मतदाताओं से संबंधित।
- करीब 1 करोड़ नाम: एक से अधिक जगह दर्ज होने के कारण डुप्लीकेट माने गए।
- लगभग 3 करोड़ नाम: सत्यापन के दौरान पता नहीं चल सके या संपर्क स्थापित नहीं हो पाया।
इन आंकड़ों को संबंधित रिपोर्ट के संदर्भ में देखना चाहिए। अलग-अलग राज्यों और पुनरीक्षण के चरणों के अनुसार संख्या में अंतर हो सकता है।
सुरजीत भल्ला ने कैसे निकाला 70 लाख का अनुमान?
भल्ला ने मतदाताओं की संभावित संख्या का आकलन करने के लिए वयस्क आबादी और मतदाता सूची में दर्ज नामों के बीच तुलना की। उनके अनुमान के मुताबिक, 2026 के मध्य तक देश में 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोगों की संख्या करीब 100.8 करोड़ हो सकती है।
उन्होंने युवा मतदाताओं और अधिक उम्र के लोगों में मतदाता सूची में पंजीकरण न होने की संभावित दर को ध्यान में रखते हुए कुल वयस्क आबादी के लगभग 8.5 प्रतिशत लोगों के पंजीकृत न होने का अनुमान लगाया। इस आधार पर उन्होंने एक संभावित मतदाता सूची का आकार निकाला।
इसके बाद नौ बड़े राज्यों के अंतिम मतदाता आंकड़ों की तुलना अपने अनुमान से की गई। भल्ला की गणना में इन राज्यों के लिए संभावित स्वच्छ मतदाता सूची का आकार लगभग 53.51 करोड़ बैठता है, जबकि अंतिम सूची में करीब 52.78 करोड़ नाम दर्ज बताए गए। दोनों के बीच लगभग 73 लाख का अंतर सामने आया।
भल्ला ने अपने आकलन में गैर-नागरिकों से संबंधित अनुमानित संख्या को अलग करने के बाद करीब 70 लाख संभावित पात्र मतदाताओं के नामों को ऐसा हिस्सा बताया, जिनके हटने की वजह उनके हिसाब से पूरी तरह स्पष्ट नहीं होती।
यह गणना आबादी, पंजीकरण दर और मतदाता सूची के अनुमानों पर आधारित है। इसलिए इसे हटाए गए नामों की आधिकारिक या अंतिम रूप से प्रमाणित संख्या नहीं माना जाना चाहिए।
ज्यादातर नाम सही कारणों से हटे होने की संभावना
भल्ला के विश्लेषण का आशय यह नहीं है कि मतदाता सूची से हटाए गए सभी नाम गलत तरीके से हटाए गए। उनके आकलन में बड़ी संख्या में नामों को हटाने के पीछे वैध कारण हो सकते हैं, जैसे मतदाता की मृत्यु, स्थायी पलायन या एक से अधिक स्थानों पर पंजीकरण।
रिपोर्ट में उनके अनुमान के अनुसार, जिन राज्यों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया, वहां हटाए गए नामों के बड़े हिस्से की वजह उचित हो सकती है। हालांकि, शेष मामलों में स्पष्टता लाने और संभावित पात्र मतदाताओं के नामों की जांच करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।
मतदाता सूची में नाम कटने पर अपील का विकल्प
मतदाता सूची से नाम हटने के मामलों में संबंधित व्यक्ति को निर्धारित प्रक्रिया के तहत दावा या अपील करने का अवसर मिल सकता है। रिपोर्ट में सितंबर में चुनाव आयोग की ओर से सुप्रीम कोर्ट को दी गई जानकारी का उल्लेख करते हुए बताया गया कि करीब 22.2 लाख अपीलें दाखिल की गई थीं।
भल्ला के विश्लेषण में यह भी कहा गया कि उस समय तक जिन अपीलों का निपटारा हुआ था, उनमें से लगभग 93 प्रतिशत मामलों में संबंधित लोगों को पात्र मतदाता पाया गया। हालांकि, उस समय तक निपटाई गई अपीलों की संख्या करीब 1.3 लाख बताई गई थी। इसलिए इस प्रतिशत को सभी अपीलों या पूरे देश के मामलों का अंतिम नतीजा नहीं समझना चाहिए।
अपीलों के निपटारे और पात्र पाए गए लोगों के आंकड़े यह समझने में मदद कर सकते हैं कि मतदाता सूची से नाम हटने के बाद शिकायतों का समाधान किस तरह हो रहा है।
तार्किक विसंगतियों वाले नामों पर भी चर्चा
भल्ला ने मतदाता सूचियों में दर्ज कुछ नामों को लेकर तार्किक विसंगतियों और सत्यापन की प्रक्रिया का भी जिक्र किया। उनके विश्लेषण में लगभग 60 लाख मतदाताओं को ऐसी विसंगतियों के आधार पर चिह्नित किए जाने और अप्रैल 2026 में न्यायिक अधिकारियों द्वारा करीब 27 लाख नाम हटाए जाने का उल्लेख है।
उन्होंने इन हटाए गए नामों में मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी लगभग दो-तिहाई होने का दावा भी किया। इस दावे को स्वतंत्र रूप से जांचे गए आधिकारिक आंकड़ों और संबंधित राज्यवार विवरण के संदर्भ में देखना जरूरी है। केवल इस आंकड़े के आधार पर किसी पूरे समुदाय के साथ भेदभाव होने या न होने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
बिहार की मतदाता सूची पर क्या कहा?
बिहार के संदर्भ में भल्ला के अनुमान और अंतिम मतदाता सूची के आंकड़ों में भी अंतर बताया गया है। उनके आकलन के अनुसार, राज्य की अंतिम सूची में नामों की संख्या उनके अनुमानित आंकड़े से लगभग 60 लाख अधिक थी।
उन्होंने इसकी एक संभावित वजह प्रवासी कामगारों को बताया, जिनके नाम बिहार की मतदाता सूची में बने रह सकते हैं, भले ही वे रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में रह रहे हों। यह उनका विश्लेषण है; मतदाता के वास्तविक निवास, पंजीकरण और पात्रता का निर्धारण संबंधित नियमों तथा आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर ही किया जा सकता है।
SIR का उद्देश्य और पारदर्शिता की जरूरत
विशेष गहन पुनरीक्षण का उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन करना, मृत मतदाताओं के नाम हटाना, डुप्लीकेट प्रविष्टियों की पहचान करना और पात्र नागरिकों का सही पंजीकरण सुनिश्चित करना है। इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि पात्र मतदाता का नाम गलती से सूची से न हटे और प्रभावित व्यक्ति को सुधार या अपील का प्रभावी अवसर मिले।
सुरजीत भल्ला के विश्लेषण में सामने आया करीब 70 लाख का आंकड़ा इसी सवाल को उठाता है कि मतदाता सूची में हुए बदलावों के पीछे कारण कितने स्पष्ट हैं। अंतिम स्थिति समझने के लिए चुनाव आयोग के आधिकारिक आंकड़ों, राज्यवार सूचियों और अपीलों के नतीजों को साथ रखकर देखना होगा।



