India warns UNSC food crisis: दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जारी संघर्षों के बीच भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) को वैश्विक खाद्य सुरक्षा को लेकर गंभीर चेतावनी दी है। भारत ने कहा है कि आधुनिक समय के युद्धों का असर केवल युद्धक्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि ऊर्जा बाजार, उर्वरक आपूर्ति, समुद्री परिवहन, मानवीय सहायता और कृषि व्यापार पर भी पड़ता है। इन क्षेत्रों में आने वाली रुकावटें दुनिया के कई देशों में खाद्य संकट को और गहरा कर सकती हैं। भारत ने सुरक्षा परिषद से अपील की कि संघर्षों के कारण पैदा होने वाले मानवीय संकट को कम करना उसकी प्राथमिकता होनी चाहिए।
सुरक्षा परिषद में ‘फूड अंडर फायर: ग्लोबल और लोकल फूड संकट को कम करने में सुरक्षा परिषद की भूमिका’ विषय पर हुई खुली बहस में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने भारत का पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि संघर्षों का प्रभाव अब केवल उन देशों या क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहता जहां लड़ाई हो रही है। युद्ध और तनाव के कारण ऊर्जा की कीमतों में बदलाव, खाद और उर्वरकों की आपूर्ति में बाधा, समुद्री व्यापार मार्गों में रुकावट और मानवीय सहायता पहुंचाने में मुश्किल जैसी समस्याएं पैदा होती हैं। इसका सीधा असर वैश्विक खाद्य आपूर्ति पर पड़ता है।
भारत ने विशेष रूप से उन विकासशील देशों की चिंता सामने रखी जो अपनी खाद्य जरूरतों के लिए आयात पर काफी हद तक निर्भर हैं। पी. हरीश ने कहा कि ऐसे देशों के लिए वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में थोड़ी सी भी बड़ी रुकावट गंभीर समस्या पैदा कर सकती है। जब युद्ध के कारण खाद्य पदार्थों, ऊर्जा या उर्वरकों की कीमत बढ़ती है तो इसका बोझ सबसे ज्यादा कमजोर अर्थव्यवस्थाओं और आम लोगों पर पड़ता है।
भारत ने सुरक्षा परिषद से यह भी सुनिश्चित करने की अपील की कि उसके द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों या अन्य कदमों से मानवीय सहायता और वैध खाद्य एवं कृषि व्यापार अनजाने में प्रभावित न हो। भारत का कहना है कि युद्ध प्रभावित इलाकों में जरूरतमंद लोगों तक राहत सामग्री पहुंचाना बेहद जरूरी है। इसके लिए सुरक्षित, तेज और बिना रुकावट मानवीय सहायता की व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी। साथ ही संघर्षों को रोकने और तनाव कम करने के लिए प्रभावी प्रयास किए जाने चाहिए।
हालांकि भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि खाद्य-सुरक्षित समाज बनाने की प्राथमिक जिम्मेदारी संबंधित देशों की राष्ट्रीय सरकारों की है। संयुक्त राष्ट्र का विकास तंत्र और रोम स्थित खाद्य एवं कृषि से जुड़ी एजेंसियां इस दिशा में देशों की मदद करती हैं। सुरक्षा परिषद की भूमिका मुख्य रूप से संघर्षों से पैदा होने वाले मानवीय संकट को कम करने और शांति एवं स्थिरता के लिए माहौल तैयार करने की है।
इस दौरान भारत ने अपनी खाद्य सुरक्षा व्यवस्था का भी उल्लेख किया। पी. हरीश ने कहा कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत सब्सिडी वाले अनाज का कानूनी अधिकार दिया गया है। इसके अलावा पीएम-किसान योजना के जरिए 11 करोड़ से अधिक किसान परिवारों तक प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता पहुंचाई जा रही है। भारत का कहना है कि ऐसी योजनाओं से छोटे और सीमांत किसानों को आर्थिक मजबूती मिलती है और देश की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था भी मजबूत होती है।
भारत ने टिकाऊ और जलवायु-अनुकूल कृषि को भी वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण बताया। वर्ष 2023 को ‘इंटरनेशनल ईयर ऑफ मिलेट्स’ के रूप में बढ़ावा देने में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। भारत का कहना है कि मोटे अनाज पोषण की दृष्टि से महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ बदलती जलवायु परिस्थितियों में भी उपयोगी फसल साबित हो सकते हैं। इसके अलावा डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और आधुनिक कृषि तकनीकों के इस्तेमाल से खेती को अधिक प्रभावी और टिकाऊ बनाने पर भी भारत जोर दे रहा है।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी वैश्विक खाद्य आपूर्ति को प्रभावित करने वाले मौजूदा संघर्षों पर चिंता जताई। उन्होंने यूक्रेन, होर्मुज जलडमरूमध्य और लाल सागर की परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन क्षेत्रों में जारी तनाव का असर खाद्य और ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ रहा है। यूक्रेन युद्ध के कारण काला सागर के रास्ते अनाज और ऊर्जा के निर्यात पर असर पड़ा है। रूस और यूक्रेन दोनों ही वैश्विक कृषि और ऊर्जा बाजार के लिए महत्वपूर्ण हैं।
गुटेरेस ने होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर भी गंभीर चिंता जताई। उनके मुताबिक यह मार्ग दुनिया की करीब पांचवीं हिस्से की तेल आपूर्ति और लगभग एक-तिहाई उर्वरक व्यापार से जुड़ा है। इस मार्ग में रुकावट आने से ऊर्जा और उर्वरक की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है और उपलब्धता कम हो सकती है। इसका सीधा असर खेती की लागत और अंततः खाद्य पदार्थों की कीमतों पर पड़ सकता है।
लाल सागर में वाणिज्यिक जहाजों पर हमलों ने भी वैश्विक सप्लाई चेन के लिए चुनौती बढ़ाई है। समुद्री मार्गों में जोखिम बढ़ने पर जहाजों को वैकल्पिक रास्तों से भेजना पड़ सकता है, जिससे परिवहन का समय और लागत दोनों बढ़ते हैं। इसका असर खाद्य पदार्थों और कृषि से जुड़े उत्पादों की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
गुटेरेस ने होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए उर्वरक और अनाज की आवाजाही के लिए सुरक्षित कॉरिडोर बनाने का प्रस्ताव भी रखा है। उन्होंने बताया कि संयुक्त राष्ट्र ने इस दिशा में व्यावहारिक व्यवस्था सुझाई है। शुरुआत में उर्वरक और उससे जुड़े कच्चे माल की सुरक्षित आवाजाही पर ध्यान दिया जाएगा और आगे इसे अन्य उत्पादों तक भी बढ़ाया जा सकता है।
संयुक्त राष्ट्र के ऑफिस फॉर प्रोजेक्ट सर्विसेज (UNOPS) की अगुवाई में एक टास्क फोर्स ने उर्वरक और संबंधित उत्पाद ले जाने वाले जहाजों के रजिस्ट्रेशन और वेरिफिकेशन के लिए एक ढांचा भी तैयार किया है। इसका उद्देश्य संबंधित जहाजों की आवाजाही को सुरक्षित और सुगम बनाना है। अब इस व्यवस्था को लागू करने के लिए संघर्ष से जुड़े पक्षों के सहयोग और राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है।
भारत और संयुक्त राष्ट्र की यह चिंता ऐसे समय सामने आई है जब दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव वैश्विक व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित कर रहे हैं। साफ है कि किसी एक क्षेत्र में शुरू हुआ संघर्ष अब केवल स्थानीय समस्या नहीं रह जाता। ऊर्जा, खाद, अनाज और समुद्री व्यापार के रास्ते बाधित होने पर उसका असर हजारों किलोमीटर दूर बैठे लोगों की रसोई और किसानों की लागत तक पहुंच सकता है। ऐसे में भारत का संदेश साफ है कि युद्ध और संघर्ष जितना लंबा खिंचेगा, वैश्विक खाद्य संकट का खतरा भी उतना ही बढ़ सकता है।



