Xi Jinping India Visit: चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भारत दौरे को लेकर सस्पेंस लगातार बना हुआ है। नई दिल्ली में 12 और 13 सितंबर को 18वें BRICS शिखर सम्मेलन का आयोजन होना है, लेकिन अब तक चीन की ओर से आधिकारिक तौर पर यह पुष्टि नहीं की गई है कि शी जिनपिंग इस बैठक में हिस्सा लेने भारत आएंगे या नहीं। यही वजह है कि उनकी संभावित यात्रा को लेकर कूटनीतिक हलकों में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है।
माना जा रहा है कि अगर शी जिनपिंग भारत आते हैं तो यह करीब सात साल बाद उनकी पहली भारत यात्रा होगी। उनकी संभावित यात्रा ऐसे समय में हो रही है, जब भारत और चीन के बीच संबंधों में कुछ क्षेत्रों में सुधार की कोशिशें जारी हैं, लेकिन सीमा विवाद और अरुणाचल प्रदेश को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद अब भी कायम हैं।
शी जिनपिंग की भारत यात्रा को लेकर हालिया रिपोर्टों में कहा गया है कि चीनी राष्ट्रपति एक बड़े प्रतिनिधिमंडल के साथ नई दिल्ली पहुंच सकते हैं। हालांकि, चीन ने अभी तक इस संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है। यही चुप्पी सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बनी हुई है। सवाल यह है कि जब BRICS सम्मेलन की तारीख तय है और तैयारियां चल रही हैं, तो बीजिंग ने अब तक अपने राष्ट्रपति की भागीदारी की पुष्टि क्यों नहीं की है?
इस सस्पेंस को भारत और चीन के बीच हालिया घटनाक्रम से भी जोड़कर देखा जा रहा है। इस महीने भारत ने अरुणाचल प्रदेश में 27 स्थानों के नाम तय करने की घोषणा की थी। चीन पहले भी अरुणाचल प्रदेश के इलाकों के नाम बदलकर उन पर अपना दावा जताता रहा है। भारत लगातार चीन की ऐसी कोशिशों को खारिज करता रहा है और अरुणाचल प्रदेश को भारत का अभिन्न हिस्सा बताता रहा है।
भारत की इस घोषणा के बाद चीन के रणनीतिक मामलों के जानकारों की ओर से तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। चीन की सरकारी व्यवस्था से जुड़े मीडिया और विशेषज्ञों ने भी इस मुद्दे पर भारत के रुख की आलोचना की। ऐसे में शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा को सीमा विवाद के मौजूदा माहौल से अलग करके देखना आसान नहीं है।
चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के नियंत्रण वाले अखबार ‘चाइना डेली’ ने भी अगस्त में भारत-चीन सीमा विवाद को लेकर कड़ा रुख अपनाया था। अखबार के एक संपादकीय में भारत और चीन के सीमा विवाद के इतिहास का हवाला देते हुए सावधानी बरतने की बात कही गई थी। इससे संकेत मिला कि बीजिंग में भारत के साथ संबंधों को लेकर पूरी तरह से राजनीतिक उत्साह का माहौल नहीं है।
हालांकि, दूसरी तरफ भारत और चीन के बीच उच्च स्तर पर संपर्क भी जारी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से पहले ही शी जिनपिंग को भारत आने का निमंत्रण दिया जा चुका है। भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी भी BRICS शिखर सम्मेलन की तैयारियों और द्विपक्षीय मुद्दों पर चर्चा के लिए बीजिंग का दौरा कर चुके हैं। ऐसे में दोनों देशों के बीच संवाद के रास्ते खुले हुए हैं।
शी जिनपिंग की BRICS बैठक में मौजूदगी इसलिए भी महत्वपूर्ण होगी क्योंकि चीन इस समूह के प्रमुख सदस्यों में से एक है। BRICS का विस्तार होने के बाद संगठन का वैश्विक प्रभाव भी बढ़ा है। भारत और चीन दोनों ही इसके महत्वपूर्ण सदस्य हैं। अगर चीनी राष्ट्रपति लगातार दूसरे साल BRICS शिखर सम्मेलन से दूर रहते हैं, तो इससे उनकी प्राथमिकताओं और चीन की कूटनीतिक रणनीति को लेकर सवाल उठ सकते हैं।
इससे पहले भी शी जिनपिंग की महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय बैठकों में अनुपस्थिति चर्चा का विषय रही है। 2023 में नई दिल्ली में हुए G20 शिखर सम्मेलन में भी चीनी राष्ट्रपति शामिल नहीं हुए थे। इसके बजाय चीन का प्रतिनिधित्व तत्कालीन प्रधानमंत्री ली कियांग ने किया था। बाद में इस अनुपस्थिति को लेकर अलग-अलग तरह के कयास लगाए गए थे।
2025 में रियो डी जनेरियो में हुए BRICS शिखर सम्मेलन में भी शी जिनपिंग की मौजूदगी नहीं रही। उस समय उनकी अनुपस्थिति के पीछे व्यावहारिक और कूटनीतिक दोनों तरह के कारणों की चर्चा हुई। कुछ विश्लेषकों ने कार्यक्रमों के समय में टकराव और ब्राजील के राष्ट्रपति के साथ शी की पहले हो चुकी बैठकों को वजह माना, जबकि कुछ ने भारत से जुड़े कूटनीतिक पहलुओं की ओर भी इशारा किया।
अब 2026 में नई दिल्ली में होने वाला BRICS सम्मेलन शी जिनपिंग के लिए एक अहम कूटनीतिक मंच हो सकता है। अगर वह भारत आते हैं तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी मुलाकात पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी। दोनों नेताओं के बीच बातचीत में सीमा विवाद, व्यापार, निवेश, सीधी उड़ान, वीजा और द्विपक्षीय संबंधों से जुड़े कई मुद्दे उठ सकते हैं।
कुछ अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि शी जिनपिंग की यात्रा को लेकर बनाया गया सस्पेंस चीन की रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है। बीजिंग संभवतः भारत से कुछ मुद्दों पर रियायत या सकारात्मक कदम चाहता हो। इनमें चीनी निवेश और कारोबार के लिए बेहतर माहौल, वीजा नियमों में ढील और दोनों देशों के बीच सीधी कनेक्टिविटी बढ़ाने जैसे विषय शामिल हो सकते हैं।
इसके अलावा तिब्बत और ताइवान जैसे संवेदनशील मुद्दे भी चीन की रणनीतिक प्राथमिकताओं में शामिल हो सकते हैं। चीन लंबे समय से इन मुद्दों पर भारत से अपने रुख को लेकर सावधानी बरतने की अपेक्षा करता रहा है। ऐसे में शी जिनपिंग की यात्रा की पुष्टि को अंतिम समय तक रोककर रखना बीजिंग को बातचीत में कुछ रणनीतिक बढ़त देने वाला कदम माना जा सकता है।
हालांकि, यह भी संभव है कि चीन की ओर से अंतिम निर्णय सुरक्षा, घरेलू राजनीतिक कार्यक्रम या अन्य कूटनीतिक प्राथमिकताओं को ध्यान में रखकर लिया जाए। इसलिए जब तक बीजिंग की ओर से आधिकारिक घोषणा नहीं होती, तब तक शी जिनपिंग की भारत यात्रा को लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।
BRICS सम्मेलन के लिहाज से भी शी जिनपिंग का फैसला बेहद अहम है। अगर वह नई दिल्ली आते हैं तो भारत और चीन के बीच लंबे समय से चले आ रहे मतभेदों के बावजूद उच्च स्तरीय संवाद की नई शुरुआत का संकेत मिल सकता है। वहीं अगर वह बैठक से दूर रहते हैं तो इससे दोनों देशों के संबंधों में मौजूद चुनौतियों और BRICS के भीतर उनकी प्राथमिकताओं को लेकर नई चर्चा शुरू हो सकती है।
फिलहाल शी जिनपिंग की भारत यात्रा पर अंतिम फैसला चीन की ओर से आना बाकी है। नई दिल्ली में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन से पहले उनकी संभावित यात्रा ने भारत-चीन संबंधों को एक बार फिर वैश्विक कूटनीति के केंद्र में ला दिया है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि बीजिंग कब अपने पत्ते खोलता है और क्या शी जिनपिंग सितंबर में नई दिल्ली पहुंचकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करते हैं।



