Global Politics:
नई दिल्ली में होने जा रहे BRICS Summit 2026 से पहले भारत और चीन के संबंध एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का भारत दौरा केवल एक कूटनीतिक कार्यक्रम नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे दोनों देशों के रिश्तों में संभावित बदलाव के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है।
कई वर्षों के तनाव के बाद संवाद पर जोर
पिछले कुछ वर्षों में सीमा विवाद और सैन्य तनाव के कारण दोनों देशों के रिश्तों में खटास आई थी। हालांकि हाल के दौर में दोनों पक्षों ने बातचीत और सहयोग बढ़ाने के संकेत दिए हैं। BRICS सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग के बीच संभावित मुलाकात पर भी नजरें टिकी हुई हैं।
व्यापार और अर्थव्यवस्था भी एजेंडे में
विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देश केवल सीमा से जुड़े मुद्दों पर ही नहीं, बल्कि व्यापार, निवेश, बाजार पहुंच और आर्थिक सहयोग जैसे विषयों पर भी चर्चा कर सकते हैं। इससे कारोबारी संबंधों को नई दिशा मिलने की संभावना जताई जा रही है।
भरोसे की कमी अब भी बड़ी चुनौती
हालांकि संवाद बढ़ने के बावजूद दोनों देशों के बीच पूरी तरह भरोसा बहाल नहीं हुआ है। सीमा से जुड़े पुराने विवाद, क्षेत्रीय रणनीति और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा अभी भी रिश्तों को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक बने हुए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि संबंधों में सुधार की प्रक्रिया लंबी और चरणबद्ध हो सकती है।
BRICS मंच क्यों है महत्वपूर्ण?
इस बार का BRICS Summit ऐसे समय में हो रहा है जब दुनिया कई भू-राजनीतिक और आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे में भारत और चीन जैसे बड़े देशों के बीच संवाद वैश्विक राजनीति और क्षेत्रीय स्थिरता दोनों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
भारत और चीन के रिश्तों में फिलहाल टकराव की जगह संवाद का माहौल दिखाई दे रहा है। फिर भी यह कहना जल्दबाजी होगी कि सभी मतभेद खत्म हो गए हैं। BRICS Summit के दौरान होने वाली बातचीत यह तय कर सकती है कि दोनों पड़ोसी देश आने वाले वर्षों में सहयोग का रास्ता चुनते हैं या प्रतिस्पर्धा का।



