National Project: उत्तर भारत में लंबे समय से चर्चा में रही किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना अब जमीन पर उतरने की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाती दिख रही है। जल बंटवारे और लागत साझेदारी को लेकर वर्षों से अटकी इस योजना पर छह राज्यों के बीच सहमति बन गई है। माना जा रहा है कि यह समझौता आने वाले समय में पानी, बिजली और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकता है।
दिल्ली में होगा महत्वपूर्ण समझौता
नई दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली के प्रतिनिधि समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करेंगे। इससे परियोजना के वित्तीय और तकनीकी पहलुओं को अंतिम रूप मिलने का रास्ता साफ होगा।
परियोजना से किन राज्यों को मिलेगा पानी?
प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार विभिन्न राज्यों को तय मात्रा में जल उपलब्ध कराया जाएगा।
- हरियाणा : 836 क्यूसेक
- उत्तर प्रदेश : 543.2 क्यूसेक
- राजस्थान : 163.52 क्यूसेक
- दिल्ली : 105.28 क्यूसेक
इस वितरण प्रणाली का उद्देश्य भविष्य की जल जरूरतों को संतुलित करना है।
टोंस नदी पर बनेगा विशाल बांध
किशाऊ परियोजना उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर स्थित टोंस नदी पर विकसित की जाएगी। यह नदी यमुना की प्रमुख सहायक नदियों में गिनी जाती है।
योजना के तहत 232.6 मीटर ऊंचे बांध का निर्माण प्रस्तावित है। परियोजना पूरी होने के बाद यह देश के सबसे बड़े बांधों में शामिल हो सकती है।
660 मेगावॉट हरित ऊर्जा का लक्ष्य
किशाऊ परियोजना केवल जल भंडारण तक सीमित नहीं है। इससे 660 मेगावॉट तक बिजली उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। अनुमान है कि हर वर्ष बड़ी मात्रा में स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादन होगा, जिससे क्षेत्रीय बिजली जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलेगी।
यमुना नदी को मिलेगा अतिरिक्त प्रवाह
विशेषज्ञों के अनुसार परियोजना से गर्मी के मौसम में यमुना नदी में जल प्रवाह बनाए रखने में सहायता मिलेगी। इसके अलावा मानसून के दौरान अतिरिक्त जल को नियंत्रित कर बाढ़ की समस्या को कम करने में भी मदद मिल सकती है।
क्यों महत्वपूर्ण माना जा रहा है यह प्रोजेक्ट?
करीब 15 हजार करोड़ रुपये की लागत वाली यह परियोजना जल संरक्षण, सिंचाई, पेयजल आपूर्ति, बिजली उत्पादन और बाढ़ प्रबंधन जैसे कई उद्देश्यों को एक साथ पूरा करने की क्षमता रखती है। यही वजह है कि इसे उत्तर भारत की सबसे महत्वपूर्ण आधारभूत परियोजनाओं में गिना जा रहा है।
छह दशक बाद सुलझा बड़ा मुद्दा
किशाऊ परियोजना का विचार कई दशक पहले सामने आया था, लेकिन राज्यों के बीच सहमति नहीं बनने के कारण काम आगे नहीं बढ़ सका। अब व्यापक सहमति बनने के बाद उम्मीद की जा रही है कि निर्माण प्रक्रिया में तेजी आएगी और परियोजना के लाभ जल्द दिखाई देने लगेंगे।



