UP Politics: कुर्मी वोट बैंक पर BJP-सपा की नजर, पटेल जयंती से साधेंगे सियासी समीकरण

UP Politics: बीजेपी 31 अक्टूबर को प्रदेश के 98 संगठनात्मक जिलों में मनाएगी सरदार पटेल की जयंती, वाराणसी की रोहनिया सीट से अखिलेश यादव के चुनावी अभियान शुरू करने की भी चर्चा।

UP Politics: उत्तर प्रदेश की राजनीति में कुर्मी समाज के मतदाताओं को लेकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) और समाजवादी पार्टी (SP) की सक्रियता बढ़ती दिखाई दे रही है। विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच दोनों दल अपने-अपने सामाजिक और राजनीतिक समीकरण मजबूत करने में जुटे हैं। राजनीतिक आकलनों के अनुसार, प्रदेश की लगभग 50 से 60 विधानसभा सीटों पर कुर्मी मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

इसी रणनीति के तहत बीजेपी ने 31 अक्टूबर को सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती प्रदेश के सभी 98 संगठनात्मक जिलों में मनाने की तैयारी की है। दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के वाराणसी की रोहनिया विधानसभा सीट पर रैली के जरिए चुनावी अभियान शुरू करने की संभावना को लेकर चर्चा है। हालांकि, सपा की ओर से अभी इस कार्यक्रम की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

बीजेपी की रणनीति में कुर्मी नेताओं की अहम भूमिका

उत्तर प्रदेश में कुर्मी समाज को साधने के लिए बीजेपी संगठन और सहयोगी दलों के जरिए अपनी पहुंच मजबूत करने की कोशिश कर रही है। पार्टी के पिछड़ा मोर्चा की ओर से आयोजित होने वाले पटेल जयंती कार्यक्रम को भी इसी व्यापक राजनीतिक रणनीति के संदर्भ में देखा जा रहा है।

रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर प्रदेश बीजेपी के प्रभारी विनोद तावड़े और सह-प्रभारी जगदीश पटेल का संबंध कुर्मी समुदाय से है। वहीं, केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी को उत्तर प्रदेश बीजेपी की कमान सौंपे जाने को भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पंकज चौधरी महाराजगंज से सांसद हैं और कुर्मी समाज के प्रमुख नेताओं में गिने जाते हैं।

इसके अलावा, बीजेपी ने पूर्व सांसद रेखा वर्मा को पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए रखा है। पार्टी की पिछड़ा वर्ग राजनीति में अपना दल (एस) के साथ गठबंधन भी अहम भूमिका निभाता रहा है। अपना दल (एस) की अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल केंद्र सरकार में मंत्री हैं और कुर्मी समाज के प्रमुख राजनीतिक चेहरों में शामिल हैं।

31 अक्टूबर को प्रदेश के 98 जिलों में पटेल जयंती मनाएगी बीजेपी

बीजेपी के पिछड़ा मोर्चा की योजना के अनुसार, 31 अक्टूबर को सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती प्रदेश के सभी 98 संगठनात्मक जिलों में आयोजित की जाएगी। पार्टी इन कार्यक्रमों के जरिए पटेल के योगदान को याद करने के साथ-साथ सामाजिक समूहों तक अपनी राजनीतिक पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर सकती है।

उत्तर प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं की भूमिका चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण रही है। ऐसे में पटेल जयंती जैसे आयोजनों को लेकर राजनीतिक दलों की तैयारियों पर नजर रखी जा रही है।

हालांकि, किसी आयोजन का चुनावी असर कितना होगा, यह स्थानीय परिस्थितियों, उम्मीदवारों और मतदाताओं की प्राथमिकताओं पर निर्भर करेगा।

अखिलेश यादव की रोहनिया रैली को लेकर चर्चा

बीजेपी की तैयारियों के बीच समाजवादी पार्टी भी कुर्मी मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में जुटी है। चर्चा है कि अखिलेश यादव 31 अक्टूबर को सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती पर वाराणसी से अपने चुनावी अभियान की शुरुआत कर सकते हैं।

इसके लिए वाराणसी की रोहनिया विधानसभा सीट को संभावित रैली स्थल के रूप में देखा जा रहा है। इस क्षेत्र में कुर्मी समाज की उल्लेखनीय आबादी बताई जाती है, जिसके कारण यह सीट राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जाती है।

रिपोर्ट के अनुसार, सपा सांसद धर्मेंद्र यादव ने कुछ दिन पहले वाराणसी पहुंचकर स्थानीय नेताओं के साथ बैठक की थी। इस बैठक के बाद रैली की संभावित तैयारियों को लेकर चर्चाएं बढ़ीं। हालांकि, समाजवादी पार्टी की ओर से कार्यक्रम की तारीख, स्थान और अखिलेश यादव की उपस्थिति की आधिकारिक पुष्टि होना अभी बाकी है।

यूपी की कितनी सीटों पर प्रभाव डाल सकता है कुर्मी वोट बैंक?

कुर्मी समाज उत्तर प्रदेश के प्रमुख अन्य पिछड़ा वर्गों में शामिल है। उपलब्ध राजनीतिक अनुमानों के मुताबिक, राज्य की कुल आबादी में इस समुदाय की हिस्सेदारी लगभग 4 से 5 प्रतिशत बताई जाती है। इसकी मौजूदगी पूर्वांचल, अवध, रुहेलखंड और बुंदेलखंड के कई क्षेत्रों में है।

राजनीतिक आकलनों के अनुसार, प्रदेश की करीब 50 से 60 विधानसभा सीटों पर कुर्मी मतदाता चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की स्थिति में हो सकते हैं। वहीं, लगभग 130 सीटों पर इस समुदाय की मौजूदगी बताई जाती है।

महाराजगंज, संत कबीर नगर, बस्ती, बाराबंकी, फतेहपुर, प्रतापगढ़, कौशांबी, प्रयागराज, मिर्जापुर, सोनभद्र और बरेली जैसे जिलों में कुर्मी मतदाताओं की राजनीतिक अहमियत का उल्लेख किया जाता है।

हालांकि, किसी समुदाय की आबादी और चुनावी प्रभाव को एक ही आधार पर नहीं आंका जा सकता। उम्मीदवार की लोकप्रियता, स्थानीय मुद्दे, गठबंधन और क्षेत्रीय समीकरण भी मतदान के रुझान को प्रभावित करते हैं।

2022 के विधानसभा चुनाव में कैसा रहा कुर्मी मतदाताओं का रुझान?

खबर में CSDS-Lokniti के हवाले से दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कुर्मी मतदाताओं के लगभग 66 प्रतिशत वोट NDA को मिले थे। इसी विवरण में समाजवादी पार्टी को 25 प्रतिशत, बहुजन समाज पार्टी को 3 प्रतिशत, कांग्रेस को 4 प्रतिशत और अन्य दलों को 2 प्रतिशत वोट मिलने की बात कही गई है।

इन आंकड़ों के अनुसार, पिछले विधानसभा चुनाव में कुर्मी मतदाताओं के बीच NDA को बढ़त मिली थी। हालांकि, इस रुझान को आगामी चुनाव में भी यथावत रहने की गारंटी नहीं माना जा सकता। राजनीतिक परिस्थितियों और स्थानीय मुद्दों में बदलाव के साथ मतदाताओं की पसंद भी बदल सकती है।

नोट: इन आंकड़ों को प्रकाशित करने से पहले CSDS-Lokniti के मूल सर्वेक्षण और उसके नमूने की पुष्टि करना जरूरी है।

विधानसभा और लोकसभा में कुर्मी समाज का प्रतिनिधित्व

रिपोर्ट में दिए गए विवरण के अनुसार, उत्तर प्रदेश विधानसभा की 403 सीटों में कुर्मी समाज से जुड़े 40 विधायक बताए गए हैं। इनमें बीजेपी के 27, समाजवादी पार्टी के 12 और कांग्रेस का एक विधायक शामिल बताया गया है।

लोकसभा में भी कुर्मी समाज से जुड़े कई नेताओं का प्रतिनिधित्व बताया गया है। रिपोर्ट में समाजवादी पार्टी के लालजी वर्मा, नरेश उत्तम पटेल, राम प्रसाद चौधरी, उत्कर्ष वर्मा, शिवपाल सिंह पटेल, कृष्णा देवी, शिवशंकर पटेल और राम शिरोमणि वर्मा के नाम शामिल हैं। बीजेपी की ओर से पंकज चौधरी, छत्रपाल सिंह गंगवार और प्रवीण पटेल तथा अपना दल (एस) की अनुप्रिया पटेल का उल्लेख किया गया है।

हालांकि, सांसदों की सूची और कुल संख्या में मूल खबर के भीतर विसंगति दिखाई देती है। इसलिए नामों, वर्तमान सदस्यता और सामाजिक पहचान की पुष्टि आधिकारिक रिकॉर्ड से किए जाने के बाद ही इस विवरण को अंतिम रूप देना उचित होगा।

चुनाव से पहले सामाजिक समीकरण साधने की कोशिश

उत्तर प्रदेश में कुर्मी मतदाताओं को लेकर बीजेपी और समाजवादी पार्टी की सक्रियता आगामी चुनाव की तैयारियों के बीच राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। बीजेपी प्रदेशव्यापी पटेल जयंती कार्यक्रम आयोजित करने जा रही है, जबकि वाराणसी में अखिलेश यादव की संभावित रैली को लेकर चर्चाएं चल रही हैं।

दोनों दलों की रणनीति और कार्यक्रमों का वास्तविक प्रभाव आने वाले समय में स्पष्ट होगा। फिलहाल, 31 अक्टूबर के आयोजन और सपा की ओर से संभावित रैली की आधिकारिक घोषणा पर राजनीतिक निगाहें टिकी हैं।

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