National / Politics: वंदे मातरम् को लेकर देश की सियासत एक बार फिर गरमा गई है। कांग्रेस कार्यसमिति की ओर से पार्टी के कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत के शुरुआती दो पदों को ही गाने के फैसले पर भारतीय जनता पार्टी ने तीखा विरोध जताया है। नई दिल्ली में भाजपा की राष्ट्रीय टीम की पहली बैठक में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया गया और कांग्रेस के फैसले के खिलाफ 10 सूत्रीय निंदा प्रस्ताव पारित किया गया।
बैठक की शुरुआत वंदे मातरम् के सभी छह छंदों के पूर्ण गायन के साथ हुई। इसके बाद भाजपा नेतृत्व ने कांग्रेस के फैसले पर सवाल उठाते हुए इसे राष्ट्रगीत, राष्ट्रीय स्वाभिमान और स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत से जोड़कर देखा। पार्टी ने इस मुद्दे को देशभर में जनता के बीच ले जाने का फैसला किया है।
भाजपा की बैठक राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की अध्यक्षता में हुई। इसमें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह समेत पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने कांग्रेस के रुख की आलोचना की। भाजपा का कहना है कि राजनीतिक लाभ या कथित वोट बैंक की राजनीति के लिए वंदे मातरम् के सम्मान और उसकी ऐतिहासिक विरासत से समझौता नहीं किया जा सकता।
भाजपा के प्रस्ताव में राष्ट्रगीत के सम्मान को राष्ट्रीय स्वाभिमान से जोड़ते हुए कांग्रेस पर निशाना साधा गया। पार्टी ने कहा कि वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान देशवासियों में राष्ट्रभावना जगाने वाला महत्वपूर्ण उद्घोष रहा है। भाजपा अब इसके इतिहास और महत्व को जनता तक पहुंचाने के लिए देशव्यापी जनसंपर्क अभियान चलाएगी।
पार्टी ने महात्मा गांधी के वंदे मातरम् से जुड़े पुराने कथन को भी अभियान का हिस्सा बनाने का फैसला किया है। भाजपा का कहना है कि राष्ट्रगीत की ऐतिहासिक भूमिका और स्वतंत्रता संग्राम से उसके संबंध को देश के हर हिस्से तक पहुंचाना जरूरी है।
वहीं, कांग्रेस अपने फैसले को ऐतिहासिक परंपरा से जोड़कर देख रही है। कांग्रेस कार्यसमिति ने कहा है कि पार्टी के कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के शुरुआती दो पद ही गाए जाएंगे। कांग्रेस नेतृत्व का तर्क है कि यह फैसला अक्टूबर 1937 में अपनाई गई उस परंपरा के अनुरूप है, जिसका संबंध महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, सुभाष चंद्र बोस और रवींद्रनाथ टैगोर जैसे नेताओं से बताया जाता है।
कांग्रेस का कहना है कि 1937 में व्यापक विचार-विमर्श के बाद वंदे मातरम् को लेकर एक व्यवस्था तय की गई थी। पार्टी उसी ऐतिहासिक परंपरा का पालन कर रही है। कांग्रेस नेताओं के मुताबिक, उनके फैसले को राष्ट्रगीत के अपमान के तौर पर पेश करना उचित नहीं है।
इसी मुद्दे पर भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। भाजपा कांग्रेस के फैसले को राष्ट्रवादी भावनाओं से जोड़ रही है, जबकि कांग्रेस इसे ऐतिहासिक परंपरा और उस समय बनी सहमति के संदर्भ में देख रही है।
वंदे मातरम् को लेकर विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब राष्ट्रगीत के सम्मान और इससे जुड़े कानूनी प्रावधानों को लेकर भी चर्चा तेज है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम से जुड़े संशोधित कानून में वंदे मातरम् को भी वैधानिक सुरक्षा देने का प्रावधान किया गया है। संसद से विधेयक पारित होने और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद इसे कानून का रूप दिए जाने की बात कही गई है।
नए कानूनी प्रावधानों के तहत राष्ट्रीय गीत के सार्वजनिक अपमान या उसके गायन में जानबूझकर बाधा डालने को लेकर सजा का प्रावधान बताया गया है। इसमें दोष सिद्ध होने पर तीन साल तक की जेल की सजा हो सकती है। हालांकि, कानून के प्रावधानों की वास्तविक व्याख्या और किसी मामले में कार्रवाई संबंधित परिस्थितियों और कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।
राजनीतिक तौर पर देखें तो भाजपा ने इस पूरे मुद्दे को व्यापक जनअभियान का विषय बनाने की तैयारी कर ली है। 10 सूत्रीय प्रस्ताव के जरिए पार्टी ने अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को इस मुद्दे पर आक्रामक रुख अपनाने का संकेत दिया है। आने वाले दिनों में देश के अलग-अलग हिस्सों में प्रदर्शन, जनसंपर्क और वंदे मातरम् के इतिहास से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाने की संभावना है।
दूसरी ओर कांग्रेस अपने फैसले को ऐतिहासिक संदर्भ में सही ठहराने की कोशिश कर रही है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह विवाद और गहरा सकता है। वंदे मातरम् के पूरे स्वरूप, उसके ऐतिहासिक संदर्भ और सार्वजनिक आयोजनों में इसके गायन को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक बहस जारी रहने के आसार हैं।
फिलहाल भाजपा ने साफ कर दिया है कि वह इस मुद्दे को केवल पार्टी की बैठक तक सीमित नहीं रखेगी। पार्टी देशभर में वंदे मातरम् के इतिहास, स्वतंत्रता आंदोलन में उसकी भूमिका और राष्ट्रभावना से जुड़े महत्व को लेकर अभियान चलाने की तैयारी में है। वहीं कांग्रेस अपने 1937 के ऐतिहासिक संदर्भ को सामने रखकर भाजपा के आरोपों का जवाब दे रही है। इस तरह राष्ट्रगीत का मुद्दा अब एक बड़े राजनीतिक विवाद का रूप लेता दिखाई दे रहा है।



