Sonia Gandhi: कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने केंद्र की भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया है कि पिछले 12 वर्षों में देश के लोकतांत्रिक ढांचे, संस्थाओं और सामाजिक ताने-बाने को काफी नुकसान पहुंचा है। द हिंदू को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि अब लोग इस नुकसान को समझने लगे हैं और उनमें बेचैनी बढ़ रही है। सोनिया गांधी ने उम्मीद जताई कि देश में बेहतर शासन व्यवस्था की वापसी होगी, हालांकि इसके लिए लंबा समय और सामूहिक राजनीतिक प्रयास करना पड़ेगा।
सोनिया गांधी का यह इंटरव्यू उनकी आने वाली किताब Belonging: A Journey of Love के प्रकाशन से पहले सामने आया है। यह किताब 10 नवंबर 2026 को प्रकाशित होने वाली है। बातचीत के दौरान उन्होंने मौजूदा राजनीतिक हालात, विपक्ष की भूमिका, कांग्रेस की रणनीति और अपने निजी राजनीतिक सफर से जुड़े कई मुद्दों पर बात रखी।
लोकतांत्रिक संस्थाओं को फिर मजबूत करना आसान नहीं होगा
सोनिया गांधी ने कहा कि पिछले 12 वर्षों में लोकतंत्र और देश की संस्थाओं को हुए नुकसान की भरपाई करना आसान नहीं होगा। उनके मुताबिक, सरकार बदलने के बाद भी संस्थाओं को पहले जैसी स्थिति में लाने के लिए लगातार प्रयास करने पड़ेंगे।
उन्होंने कहा कि इस काम में केवल एक राजनीतिक दल की भूमिका पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि इसके लिए व्यापक राजनीतिक सहयोग और सामूहिक इच्छाशक्ति की जरूरत होगी। सोनिया गांधी ने मौजूदा हालात को लेकर चिंता जताई, लेकिन साथ ही देश के लोगों पर भरोसा भी व्यक्त किया।
विपक्षी एकता को लेकर क्या बोलीं सोनिया गांधी?
विपक्षी दलों के बीच तालमेल और कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति पर बात करते हुए सोनिया गांधी ने कहा कि पार्टी समान विचारधारा वाले दलों के साथ मिलकर काम कर रही है। उन्होंने विपक्ष की संभावनाओं में सुधार की बात कही।
सोनिया गांधी ने आरोप लगाया कि मौजूदा राजनीतिक माहौल में विपक्ष को समान अवसर नहीं मिल रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार का प्रभाव विभिन्न संस्थाओं पर दिखाई देता है और निर्वाचन आयोग तथा मुख्यधारा के मीडिया की भूमिका को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं।
उन्होंने चुनावों में धनबल और धर्म के इस्तेमाल को लेकर भी चिंता जताई। सोनिया गांधी के मुताबिक, लोकतांत्रिक व्यवस्था में सभी राजनीतिक दलों को निष्पक्ष अवसर मिलना जरूरी है।
BJP और RSS के साथ समझौता नहीं करेगी कांग्रेस
कांग्रेस की वैचारिक स्थिति पर सोनिया गांधी ने स्पष्ट कहा कि पार्टी भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के साथ किसी तरह का समझौता नहीं करेगी। उन्होंने कांग्रेस की राजनीतिक और वैचारिक प्रतिबद्धता को दोहराते हुए कहा कि पार्टी अपने सिद्धांतों से पीछे नहीं हटेगी।
उनके बयान को मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में कांग्रेस की रणनीति और विपक्षी राजनीति के संदर्भ में देखा जा रहा है।
2004 में प्रधानमंत्री पद ठुकराने का कोई पछतावा नहीं
सोनिया गांधी ने वर्ष 2004 में प्रधानमंत्री पद स्वीकार नहीं करने के अपने फैसले पर भी बात की। उन्होंने कहा कि उन्हें इस निर्णय को लेकर कोई पछतावा नहीं है।
उन्होंने बताया कि उस समय उन्होंने और पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने अलग-अलग भूमिकाओं में रहते हुए एक टीम की तरह काम किया। सोनिया गांधी के मुताबिक, दोनों के बीच जिम्मेदारियों का बंटवारा था और उन्होंने मिलकर काम किया।
उनका यह बयान एक बार फिर उस राजनीतिक घटनाक्रम की चर्चा को सामने लाता है, जब वर्ष 2004 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) की जीत के बाद सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद स्वीकार नहीं किया था और डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने थे।
इंदिरा और राजीव गांधी से मिलीं जीवन की अहम सीख
इंटरव्यू में सोनिया गांधी ने अपने जीवन और परिवार से मिली सीख का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इंदिरा गांधी और राजीव गांधी से उन्हें साहस, संवेदनशीलता, धर्मनिरपेक्षता, लोकतांत्रिक मूल्यों और कर्तव्य के प्रति समर्पण की प्रेरणा मिली।
सोनिया गांधी ने अपने राजनीतिक जीवन और सार्वजनिक जिम्मेदारियों को समझने में परिवार की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। उनके मुताबिक, इन मूल्यों ने उनके व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन को दिशा दी।
आपातकाल को बताया इतिहास का अंधकारमय अध्याय
वर्ष 1975 में लगाए गए आपातकाल पर बात करते हुए सोनिया गांधी ने इसे भारतीय इतिहास का एक अंधकारमय दौर बताया। उन्होंने स्वीकार किया कि उस समय नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकार सीमित कर दिए गए थे और बंदी प्रत्यक्षीकरण यानी Habeas Corpus के अधिकार को भी निलंबित किया गया था।
सोनिया गांधी ने कहा कि आपातकाल के दौरान हुई घटनाओं की गंभीरता को उन्होंने बाद में बेहतर तरीके से समझा। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए उस समय के राजनीतिक और प्रशासनिक हालात की भी चर्चा की।
उनके मुताबिक, उस दौर में हिंसक विरोध, सरकारी कार्यालयों और सार्वजनिक परिवहन को नुकसान पहुंचाने तथा प्रशासनिक व्यवस्था में अव्यवस्था जैसी स्थितियां सामने आई थीं।
इंदिरा गांधी ने ही 1977 में चुनाव कराने का फैसला लिया था
सोनिया गांधी ने कहा कि आपातकाल का अंत लोकतांत्रिक प्रक्रिया के जरिए हुआ। उन्होंने याद दिलाया कि इंदिरा गांधी ने मार्च 1977 में लोकसभा चुनाव कराने का फैसला लिया था। सोनिया के मुताबिक, इंदिरा गांधी ने बाद में आपातकाल के दौरान हुई ज्यादतियों पर सार्वजनिक रूप से अफसोस जताया और माफी भी मांगी थी।
सोनिया गांधी की यह टिप्पणी आपातकाल के ऐतिहासिक संदर्भ और उस दौर के राजनीतिक फैसलों को लेकर उनके नजरिए को सामने रखती है।
10 नवंबर को आएगी सोनिया गांधी की किताब
सोनिया गांधी की किताब Belonging: A Journey of Love 10 नवंबर 2026 को प्रकाशित होगी। इसमें उनके जीवन के निजी और राजनीतिक अनुभवों को शामिल किया गया है। किताब में युद्ध के बाद इटली में बीता बचपन, कैम्ब्रिज में राजीव गांधी से मुलाकात, विवाह के बाद भारत आना और धीरे-धीरे भारतीय समाज तथा परिवार से जुड़ने की यात्रा का जिक्र है।
किताब में उनके निजी जीवन के साथ उन घटनाओं और परिस्थितियों पर भी बात की गई है, जिन्होंने उन्हें सार्वजनिक जीवन और राजनीति की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया।
सोनिया गांधी के इंटरव्यू में एक ओर मौजूदा सरकार और लोकतांत्रिक संस्थाओं को लेकर उनकी आलोचना सामने आई, वहीं दूसरी ओर उन्होंने अपने राजनीतिक फैसलों, परिवार से मिली सीख और आपातकाल जैसे ऐतिहासिक विषयों पर भी अपनी बात रखी।



