राष्ट्र निर्माण में योगदान देने की भावना
अपने संबोधन में जस्टिस सिंह ने कहा कि सार्वजनिक जीवन में लंबे समय तक जिम्मेदार पदों पर कार्य करने के बाद समाज और देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाना हर व्यक्ति का कर्तव्य है। उन्होंने कहा कि यदि किसी के पास अवसर और संसाधन हैं तो उसे समाजहित के कार्यों में योगदान देना चाहिए। उनका मानना है कि राष्ट्र निर्माण केवल सरकारी योजनाओं से नहीं, बल्कि नागरिकों की भागीदारी से भी मजबूत होता है।
पत्नी के साथ लिया शरीर दान का संकल्प
जस्टिस अवनींद्र कुमार सिंह ने यह भी बताया कि उन्होंने अपनी पत्नी के साथ मिलकर मृत्यु के बाद शरीर दान करने का संकल्प लिया है। उनके अनुसार, मेडिकल शिक्षा और वैज्ञानिक शोध के लिए शरीर दान एक महत्वपूर्ण सामाजिक योगदान है। इससे चिकित्सा क्षेत्र के छात्रों और शोधकर्ताओं को सीखने और अनुसंधान में मदद मिल सकती है। उन्होंने कहा कि समाज के प्रति सेवा का यह भी एक प्रभावी माध्यम है।
संघर्ष से सफलता तक का सफर
अपने विदाई भाषण में उन्होंने जीवन के संघर्षों को भी याद किया। उन्होंने बताया कि बचपन में ही मां का साया सिर से उठ गया था, लेकिन परिवार के सहयोग और मेहनत के बल पर उन्होंने आगे बढ़ने का रास्ता बनाया। उन्होंने युवाओं को संदेश देते हुए कहा कि सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता और ईमानदारी के साथ किया गया प्रयास ही स्थायी उपलब्धि दिलाता है।
तीन दशक से अधिक का न्यायिक अनुभव
जस्टिस सिंह ने करीब 36 वर्षों तक न्यायिक सेवा में अपनी जिम्मेदारियां निभाईं। उन्होंने विभिन्न जिलों में न्यायिक पदों पर कार्य किया और अपने अनुभव तथा कार्यशैली से अलग पहचान बनाई। बाद में उन्हें मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया, जहां उन्होंने कई महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई की।
रिटायरमेंट नहीं, नई शुरुआत
उन्होंने कहा कि सेवानिवृत्ति जीवन का अंत नहीं बल्कि एक नए अध्याय की शुरुआत है। न्यायिक सेवा से मुक्त होने के बाद भी वह सामाजिक और जनहित के कार्यों से जुड़े रहेंगे। उन्होंने समाज के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए कहा कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य दूसरों के लिए उपयोगी बनना है और इसी भावना के साथ वह आगे की यात्रा जारी रखेंगे।