Brazil Election 2026: ब्राजील की राजनीति में एक बार फिर बड़ा भूचाल आ गया है। देश के राष्ट्रपति पद के चुनाव में वामपंथी दिग्गज लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा ने एक बार फिर शानदार जीत हासिल की है। इस जीत के साथ ही लैटिन अमेरिका में पिछले डेढ़ साल से जारी दक्षिणपंथी ताकतों की लगातार चुनावी जीत का सिलसिला भी टूट गया है। हालांकि, इस नतीजे के सामने आते ही सियासी टकराव शुरू हो गया है और लूला के मुख्य प्रतिद्वंद्वी फ्लावियो बोल्सोनारो ने चुनाव परिणामों को मानने से इनकार करते हुए इन्हें पूरी तरह रद्द करने की मांग कर दी है।
फ्लावियो बोल्सोनारो के गंभीर आरोप
पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो के बेटे और उनके प्रतिद्वंद्वी फ्लावियो बोल्सोनारो ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर चुनाव प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि ब्राजील में चुनाव के दौरान धांधली हुई है और बिना पुख्ता सवालों के जवाब मिले इस नतीजे को स्वीकार नहीं किया जा सकता। बोल्सोनारो खेमे का मुख्य ऐतराज उस न्यायिक आदेश को लेकर है जिसके तहत खराब मौसम और परिवहन में देरी के चलते मतदान केंद्रों को 2 घंटे अतिरिक्त खुला रखने की अनुमति दी गई थी। उनका तर्क है कि चुनाव प्रक्रिया के बीच में इस तरह नियम बदलना सही नहीं था।
कड़े मुकाबले में लूला ने मारी बाजी
आधिकारिक और अंतिम चरणों के नतीजों के अनुसार, 100 प्रतिशत मतों की गिनती के बाद 80 वर्षीय लूला दा सिल्वा को 51.79 प्रतिशत वोट मिले, जबकि फ्लावियो बोल्सोनारो को 48.21 प्रतिशत मत हासिल हुए। लूला की जीत का अंतर 3.58 प्रतिशत रहा। इस महीने की शुरुआत में हुए पहले दौर के मतदान में दूसरे स्थान पर रहने के बाद लूला ने जिस तरह से वापसी की, उसने राजनीतिक पंडितों को भी हैरान कर दिया। ब्राजील के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है।
लोकतंत्र और अमेरिका के साथ संबंधों पर असर
साओ पाउलो में अपनी जीत के बाद दिए गए संबोधन में लूला ने इसे लोकतंत्र की जीत बताया और कहा कि बोल्सोनारो परिवार की सत्ता में वापसी रोकने का यही एकमात्र रास्ता था। गौर करने वाली बात यह है कि लूला के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ संबंध अक्सर तनावपूर्ण रहे हैं। ट्रंप ने पूर्व में तख्तापलट के मामलों में जायर बोल्सोनारो को बचाने के लिए टैरिफ और प्रतिबंधों का सहारा लेने की कोशिश की थी।
भविष्य की दिशा तय करेगा यह चुनाव
यह चुनाव ब्राजील के भविष्य के लिए बेहद निर्णायक माना जा रहा है। संगठित अपराध पर लगाम कसने और सुस्त अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के अलावा, आने वाले वर्षों में नए राष्ट्रपति को देश के शक्तिशाली सुप्रीम कोर्ट की 4 रिक्त सीटों पर महत्वपूर्ण नियुक्तियां करनी होंगी, जिसमें कुल 11 न्यायाधीश होते हैं। यही वजह है कि चुनाव नतीजों पर उठा यह विवाद फिलहाल थमने का नाम नहीं ले रहा है।



