माथुर। देश में विभिन्न चुनावों के दौरान उम्मीदवारों, पार्टियों की ओर से पानी की तरह पैसा बहाया जाता है। देखा जाता है कि जिला पंचायतों से लेकर पार्षदों, विधायकों, सांसदों के चुनाव में जगह-जगह जनसभाएं होती हैं और रैलियां निकाली जाती हैं। चुनाव जीतने की स्पर्धा में उम्मीदवार विज्ञापनों, पोस्टरों से सार्वजनिक स्थानों, गली-मुहल्लों को पाट देते हैं। दूसरे सरकारी विभागों से कर्मचारियों की भी चुनाव में ड्यूटी लगाई जाती है। सुरक्षा के लिए जगह-जगह भारी पुलिस बल का बंदोबस्त करना पड़ता है। इनका खर्च दलों और सरकार को वहन करना पड़ता है। अगर चुनाव प्रक्रिया में कुछ परिवर्तन कर दिए जाएं, तो इस खर्च पर लगाम लगाई जा सकती है। इसके लिए प्रचार के लिए जनसभाओं, रैलियों, विज्ञापनों, पोस्टरों पर प्रतिबंध लगाना चाहिए।चुनावों के दौरान यदि जगह-जगह जनसभाएं नहीं की जाएंगी तो जन समूह इकट्ठा नहीं होगा। जब जन समूह इकट्ठा नहीं होगा, तो टकराव नहीं होगा। तब सुरक्षा के लिए जगह-जगह पुलिस बल का बंदोबस्त भी नहीं करना पड़ेगा। इससे चुनाव प्रचार पर किए जाने वाले अनाप-शनाप खर्चे पर भी अंकुश लगेगा और जिनके पास कम पैसे हैं वे भी आसानी से चुनाव लड़ सकेंगे।प्रत्येक चुनाव को संपन्न करने के लिए चुनाव आयोग स्थानीय समाचार पत्रों और टीवी चैनलों का इस्तेमाल करे। क्षेत्रवार उम्मीदवारों की सामूहिक सूचियां बनाए। इन सूचियों में उस क्षेत्र के उम्मीदवारों के नाम, पते, फोटो, योग्यता, पार्टी का नाम आदि लिखे। चुनाव आयोग उन सामूहिक सूचियों को समाचार पत्रों और टीवी चैनलों के कार्यालयों में भिजवाए। ये अपनी सुविधानुसार प्रतिदिन सामूहिक सूचियों को प्रकाशित-प्रसारित करें। इससे मतदाता अपने-अपने क्षेत्रों के उम्मीदवारों से भली प्रकार परिचित हो जाएंगे।
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